शुभ संध्या
नमस्कार
वंदन
धन निरंकार जी
आइए श्री मद्भग्द्गीता के तृतीय अध्याय कर्म योग के श्लोक 17 18 19 पर मनन चिंतन करते हैं
श्लोक 17
यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानव: |
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ||
अर्थात
परन्तु जो मनुष्य आत्मा में ही रमण करने वाला और आत्मा में ही तृप्त तथा आत्मा में ही सन्तुष्ट हो, उसके लिए कोई कर्तव्य नहीं है॥
भाव यह है आत्म-साक्षात्कार युक्त व्यक्ति कर्म बंधन से सदैव मुक्त रहता है, उसे अन्य कर्म जो इस अध्याय में आरंभ में वर्णित हैं, करने जरुरी नहीं क्योंकि कर्म का मर्म परमात्मा का साक्षात्कार है आत्म - साक्षात्कार है।
जब हम स्वयं को शरीर मानते हैं, तब हमें प्रतीत होता है कि शरीर और मन अपनी कामनाओं की पूर्ति के लिए लालायित रहते हैं और ये हमें माया के क्षेत्र में धकेल देते हैं। संत तुलसीदास ने व्यक्त किया है:
#जिब जिब ते हरि ते बिलगानो तब ते देह गेह निज मान्यो।
माया बस स्वरूप बिसरायो तेहि भ्रम ते दारुण दुःख पायो।।
"जब जीवात्मा भगवान से विमुख हो जाती है तब माया शक्ति उस पर भ्रम का आवरण डाल देती है। इसी भ्रम के कारण हम स्वयं की पहचान शरीर के रूप में करना आरम्भ कर देते हैं और सदा के लिए स्वयं को भूल जाने के कारण हमें अत्यन्त कष्ट सहन करने पड़ते हैं।
लेकिन जो ज्ञानी पुरुष यह अनुभव करते हैं कि आत्मा का कोई भौतिक स्वरूप नहीं है और यह दिव्य है इसलिए यह अविनाशी है। संसार के नश्वर पदार्थ अविनाशी आत्मा की क्षुधा को शान्त नहीं कर सकते और इसलिए सांसारिक विषय भोगों के लिए ललचाना मूर्खता है। इस प्रकार आत्मज्ञान से आलोकित आत्माएँ अपनी चेतना को भगवान के साथ एकीकृत कर देती हैं और अपने भीतर भगवान के असीम आनन्द की अनुभूति करती हैं।
इसलिए एक को जानो एक को मानो और एक हो जाओ
यही एकत्व है और यही ब्राह्मी स्थिति है।
आइए अब देखते हैं श्लोक 18
नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन।
न चास्य सर्वभूतेषु कश्िचदर्थव्यपाश्रयः।।
अर्थात स्वरुप सिद्ध / महापुरुष का इस संसारमें न तो कर्म करनेसे कोई प्रयोजन रहता है, और न कर्म न करनेसे ही कोई प्रयोजन रहता है, तथा सम्पूर्ण प्राणियोंमें (किसी भी प्राणी पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं ) इसका किञ्चिन्मात्र भी स्वार्थका सम्बन्ध नहीं रहता।
ऐसा नहीं कि कर्म नहीं करते अपितु अनासक्त भाव से अपने कर्तव्यों का पालन सेवा भाव से करते हैं।
यहां कुछ अतीत में हुए संतों के उदाहरण लेते हैं
प्रह्लाद, ध्रुव, अम्बरीष, पृथु और विभीषण जिन्होंने ज्ञानातीत अवस्था को प्राप्त करने के पश्चात् भी अपने सांसारिक कर्तव्यों का निरन्तर पालन किया। ये सब कर्मयोगी थे। बाह्य रूप से वे अपने शारीरिक कर्तव्यों का पालन करते रहे और आंतरिक दृष्टि से उनका मन भगवान में अनुरक्त रहा।
शंकराचार्य, माध्वाचार्य, रामानुजाचार्य, चैतन्य महाप्रभु जैसे संत सांसारिक कर्मों से अलग वैराग्यपूर्ण जीवन स्वीकार किया। ये सब कर्म संन्यासी थे जो शरीर और मन सहित आंतरिक और बाह्य दोनों दृष्टि से भगवान की भक्ति में तल्लीन रहे।
चलिए अब श्लोक 19 पर दृष्टि डालने का प्रयास करते हैं
तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर।अ
सक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः।।
अर्थात
इसलिए तू निरन्तर आसक्तिरहित होकर कर्तव्य-कर्मका भलीभाँति आचरण कर; क्योंकि आसक्तिरहित होकर कर्म करता हुआ मनुष्य परमात्माको प्राप्त हो जाता है।
भाव यह है जो मनुष्य मानव परमात्मा ईश्वर को ही सब कुछ मानता है। ऐसी स्थिति ईश्वर के दर्शन और जानने से संभव होती है। अन्यथा नहीं, इसलिए संतों ने जो मूल भाव या यूं कहूं श्री मद्भग्द्गीता के 700 श्लोकों में मानव मात्र को विविध विषयों की विस्तृत जानकारी दी है। साथ में शाश्वत सनातन परमात्मा को जानने के विषय में भरपूर प्रकाश डाला है। चयन अब मानव मात्र का।
अनासक्त होकर कर्म करने का अभ्यास करते हुए परम् ब्रह्म की प्राप्ति हो जाती है। क्योंकि परमात्मा के दर्शन जानने के बाद मनुष्य को बोध हो जाता है कि इस शरीर में स्पंदन गति जीवन का कारण केवल परमात्मा का अंश आत्मा ही है। आत्म तत्व के अभाव में यह देह जिसमें 5 ज्ञानेंद्रियां 5 कर्मेन्द्रियां 5 प्राण 5 महाभूत 4 सूक्ष्म तत्व मन बुद्धि चित अहंकार 24 तत्वों से बनी यह दैवी देह साथ में
3 दोष (त्रिदोष - वात पित कफ) एवम् मल...
इसी देह में 5 कोश
अन्नमय
प्राणमय
मनोमय
विज्ञानमय
और आनंदमय
इसी देह में 7चक्र
मूलाधार
स्वाधिष्ठान
मणिपुर
अनाहत
विशुद्ध
आज्ञा
और सहस्त्रार।
विस्तार से इन विषयों पर फिर कभी लिखने का प्रयास करुंगा।
लेकिन गति का कारण जीवन का आधार आत्म तत्व है।
इसलिए संतों ने मूल तत्व को ही श्रेष्ठता दी है और मानव का ध्यान इसी ओर दिलाने का अनथक प्रयास युग युगांतकार किया। क्योंकि आत्मा का मूल परमात्म तत्व है, जो जानने योग्य है, जाना जा सकता है, देखा जा सकता है।
जानकारियों को ज्ञान समझने की भूल ना कीजिए।
जीवन बीता जाए
अवसर बीता जाए
अजहूं चेत प्यारे
कोयले को साबुन से साफ नहीं किया जा सकता, उसके मूल तत्व अग्नि में जब कोयला मिल जाता है आरंभ में लालिमा और आखिर में उजला हो जाता है।
सद्गुरु के संपर्क में आमूल रुपांतरण होता है
आमूल - लौट आना मूल Root मौलिक तत्व में
रुपांतरण - रुप का परिवर्तन।
कोयले का रुपांतरण
मनुष्य का रुपांतरण
आखिर में कहूंगा
एक पल ठहरी सखी कान्हा संग गई तो कुछ और
लौटी तो कुछ और
आज इतना ही
शेष फिर कभी।
श्रद्धापूर्वक
मानवता को समर्पित
निर्मल सोनी 🥰 🌺 ✍️
No comments:
Post a Comment