Tuesday, 19 September 2023
Sunday, 30 July 2023
पता नहीं क्यों ??? 💖💐
*पता नहीं क्यों⁉️🤔*
🪴🪴🪴
*➖ खाने को सादा दाल रोटी होती थी, लेकिन फिर भी किसी को खून की कमी नहीं होती थी (पता नहीं क्यों ?)*
*➖ स्कूल में अध्यापक खूब कान खींचते थे, डंडों से पिटाई होती थी, लेकिन कोई बच्चा स्कूल में डिप्रेशन के कारण आत्महत्या नहीं करता था (पता नहीं क्यों ?)*
*➖ बचपन में महँगे खिलौने नहीं मिलते थे, लेकिन हर खेल बहुत आनंदित करता था (पता नहीं क्यों) ?*
*➖ घर कच्चे होते थे, कमरे कम होते थे, लेकिन माता-पिता कभी वृद्धाश्रम नहीं जाते थे।* *(पता नहीं क्यों) ?*
*➖ घर में गाय की, कुत्ते की, अतिथि की रोटियां बनतीं थी, फिर भी घर का बजट संतुलित रहता था, आज सिर्फ़ अपने परिवार की रोटी महंगी हो गई है।* *(पता नहीं क्यों) ?*
*➖ महिलाओं के लिए कोई जिम या कसरत के विशेष साधन नहीं थे, फिर भी महिलाएं संपूर्ण रूप से स्वस्थ्य रहती थी (पता नहीं क्यों) ?*
*➖ भाई-भाई में, *भाई-बहनों में अनेक बार खूब झगड़ा होता था, आपस में कुटाई तक होती थी, परंतु आपस में मनमुटाव कभी नहीं होता था (पता नहीं क्यों) ?*
*➖ परिवार बहुत बडे होते थे, पडोसियों के बच्चे भी दिनभर खेलते थे, फिर भी घरों में ही शादियां होती थी (पता नहीं क्यों) ?*
*➖ माता-पिता थोडी सी बात पर थप्पड़ मार देते थे, लेकिन उनका मान-सम्मान कभी कम नहीं होता था (पता नहीं क्यों) ?*
*➖ पुरातन समय में हर घर में अध्यात्मिक वातावरण था ना कोई झगड़ा ना कोई कट्टरता और आज ना जाने कितने कथा वाचक ना जाने कितने गुरु फिर भी अध्यात्म दूर तक नज़र नहीं आता। कट्टरता ही कट्टरता जानने वाले में और ना जानने वाले में भी (पता नहीं क्यों)*
*➖ ऐसे अनेक क्यों ? *क्यों ? के सवाल दिल में उठ रहे हैं, आप सभी तक इस क्यों को पहुँचाने की कृपा करें, शायद फिर से पहले जैसा सौहार्दपूर्ण वातावरण, आपसी प्रेम, एकता का माहौल बन जाए।*
एक सार्थक पहल
एक कोशिश
नमन
शुभ रात्रि 💐💖✍️
Thursday, 27 July 2023
Tuesday, 18 July 2023
आप आदिदेव - सनातन पुरुष हो
सुप्रभात
धन निरंकार जी
प्रिय आत्मन्
आइए निद्रा में भी जागृत और जागृत में निद्रा का आनंद लेते हैं..
श्री मद्भग्वद गीता के 11वें अध्याय के इन निम्न श्लोकों द्वारा....
त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणस्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप ।।
भावार्थ : आप आदिदेव और सनातन पुरुष हैं, आप इन जगत के परम आश्रय और जानने वाले तथा जानने योग्य और परम धाम हैं। हे अनन्तरूप! आपसे यह सब जगत व्याप्त अर्थात परिपूर्ण हैं॥38॥
वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्क:प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते।
भावार्थ : आप वायु, यमराज, अग्नि, वरुण, चन्द्रमा, प्रजा के स्वामी ब्रह्मा और ब्रह्मा के भी पिता हैं। आपके लिए हजारों बार नमस्कार! नमस्कार हो!! आपके लिए फिर भी बार-बार नमस्कार! नमस्कार!!॥39॥
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वंसर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ॥
भावार्थ : हे अनन्त सामर्थ्यवाले! आपके लिए आगे से और पीछे से भी नमस्कार! हे सर्वात्मन्! आपके लिए सब ओर से ही नमस्कार हो, क्योंकि अनन्त पराक्रमशाली आप समस्त संसार को व्याप्त किए हुए हैं, इससे आप ही सर्वरूप हैं॥40।।
मेरा आग्रह रहता है कि इस पारब्रह्म परमेश्वर को जानना जरुरी है... तभी कह पाएंगे कि आप को नमस्कार. Second Person की बात हो रही है।अर्थात जो सामने उपस्थित है...
यहां हम Third Person की तरह परमात्मा को सम्बोधित नहीं कर रहे। जबकि मानव इसे कभी उपर कभी पर्वतों में तो कभी तीर्थ स्थलों पर ढूंढता है, जबकि परमात्मा का गुण है... सर्व व्यापकता। कभी शांतचित्त होकर विचार कीजिए कि हमारे शास्त्रों में कहा लिखा है। उस पर मनन चिंतन करना चाहिए। थोड़ा मुक्त कीजिए पुरातन संस्कारों से अपने आप को। सांसारिक विद्या की प्राप्ति बिना गुरु के हो नहीं सकती... तो क्या अध्यात्मिक प्राप्ति बिना सद्गुरु संभव है???
विचार कीजिए
चिंतन कीजिए
ताकि जीवन का यथार्थ प्राप्त किया जा सके।
आइए जानिए... जीवन बीता जाए.. वक्त रहते संभलिए..
नहीं तो काल सब छीन कर ले जाता है, सारा धन-वैभव,
यश, सम्पदा, मान - सम्मान, प्रतिष्ठा, यौवन सब व्यर्थ..
कुछ काम नहीं आता... अन्यथा न लें. जानिए और जीवन
मुक्ति का आनंद लीजिए मुझ संग।।।
शेष फिर कभी।
श्रद्धापूर्वक
मानवता को समर्पित
निर्मल सोनी🌺😘✍️
Sunday, 16 July 2023
अनूठा प्रसंग
त्वम् ब्रह्मास्मि 🌺
धन निरंकार जी
तुम परमात्मा में हो। लेकिन तुम लहर की भांति हो, परमात्मा सागर की भांति है। तुम रत्ती भर भी उससे दूर नहीं। रंच भर भी फासला नहीं। दूर होने का उपाय ही नहीं है। अभिन्न हो। लेकिन फिर भी तुम जान न पाओगे। जी सकते हो परमात्मा को, जान नहीं सकते। क्योंकि जीने में कोई असुविधा नहीं है, जानने में असुविधा है। क्योंकि जानने का स्वभाव है कि तुम उसे ही जान सकते हो जो तुमसे अलग है, जो तुमसे भिन्न है। जानने के लिए थोड़ी दूरी चाहिए, फासला चाहिए, थोड़ा अंतराल चाहिए। नहीं तो परिप्रेक्ष्य बनेगा नहीं। पर्सपेक्टिव चाहिए।
परमात्मा को जानने में बड़ी से बड़ी कठिनाई यही है कि उसके और तुम्हारे बीच इंच भर की भी दूरी नहीं है। कहां से खड़े होकर देखो इसे? कौन देखे दूर खड़े होकर? दूर हुआ नहीं जा सकता। तुम इससे ही जुड़े हो। तुम एक हो। दूरी होती तो हम पार कर लेते। हमने जैट ईजाद कर लिया, हम और बड़े महा जैट बना लेते; दूरी होती हम पार कर लेते। चांद पर हम पहुंच गए, कभी परमात्मा पर भी पहुंच जाते।मंगल पर भी... लेकिन परमात्मा तक नहीं।
कारण एक - परमात्मा ईश्वर से अलग ही नहीं हो आप और परमात्मा कभी खोया भी नहीं कभी
बस सद्गुरु स्मरण कराता है - यह हो तुम
त्वम् ब्रह्मास्मि
तुम ही ब्रह्म हो
ब्रह्म ही शरीर में गति का कारण है
जब यह गति स्पंदन ठहर जाता है
उसी घटना को मृत्यु कहते हैं।
खोया है खोजने के कारण। खोज रुक जाए तो तुम अभी उसे पा लो। परमात्मा को खोजना नहीं है, अपने को विश्राम में ले आना है। दौड़ शून्य हो जाए। क्योंकि दौड़ उसके लिए जो दूर हो। और जो पास हो उसके लिए दौड़ का क्या प्रयोजन है? दौड़-दौड़ कर और दूर निकल जाओगे। रुक जाओ, ठहर जाओ। यह मिला ही हुआ है। यह प्राप्त ही है। यह सदा से तुम्हारे भीतर रमा ही हुआ है। इसलिए रहस्य! अंदर ही नहीं अपितु सब जगह यही है
एक - दूसरा नहीं
बस ठहराव दीजिए
स्थितप्रज्ञ हो जाइए
बुद्ध का वह महाउद्घोष डाकू अंगुलिमाल को - मैं कब से इस ठहरे के साथ ठहरा हूं आखिर आप कब ठहरोगे।
बस ठहर गया - मन
समय भी ठहर गया और आविर्भाव हुआ आनंद का - जो आप का स्वभाव है - नियति है।
परमांनंद हुए परमांनंद को जाना ही नहीं जा सकता
ऐसे गर्भवती हुए बगैर माँ का जन्म ही नहीं हो पाता।
ऐसे परमात्मा हुए बगैर परमात्मा का प्रसाद आनंद प्राप्त नहीं हो पाता।
स्मरण कीजिए ब्रह्मज्ञान लेते हुए सद्गुरु के आवाह्न को।
ब्रह्मज्ञान से ही आत्मज्ञान संभव है
Self realization is only possible through God realization 🌺
Self is more important to be realized before death.
जीवन रहते यह अनुभूति
सद्गुरु भी ज्ञान होता है
शरीर तो निमित्त मात्र है।
कभी नरसिंह अवतार में, तो कभी वराह, कभी मछेंद्र... कभी श्री राम तो कभी श्री कृष्ण..कभी हजरत मुहम्मद कभी हजरत ईसा . कभी गुरुनानक देव जी महाराज से लेकर गुरु गोविंद सिंह जी महाराज तक...
बस शरीर निमित्त मात्र है.....
इसलिए ज्यादा बुद्धि मन का चिंतन मत कीजिए। किसी लेखक के प्रथम पाठ पढ़कर लेखक के भाव को समझ नहीं सकते।
After reading First Lesson or any one Chapter you can't be able to understand the whole perspective of writer...
इसलिए छोटी-सी बात को पकड़ कर जीवन को व्यर्थ में जाने दें।
शहनशाह जी ने एक बड़ा अनूठा शब्द बोला.... कहीं शोषित न करे कोई
इसलिए फैसला सुनाया
गुरु वचन है ज्ञान गुरु का
निरंकार है इसका नाम
सद्गुरु का सम्मान सदैव रहेगा और रहता है। लेकिन समझना होगा
शहनशाह के इस शब्द को भी
मेरे ब्यां है हलफिया लोको
हुण मैं जमणा मरणा नहीं
एक और शब्द
जिन्हां रब दा दर्शन कीता एहनां दा सत्कार करो।
रब बोले एहनां दे अन्दर एहनां नूं नमस्कार करो ।।
नकल'च लुक्या असल है जेहड़ा एहदे
नाल प्यार करो
ख्याल रखना प्रेम सिर्फ व सिर्फ नकल में असल यह जो परमात्मा है इस से करने को कहा कि गया है।
जिन्ह प्रेम कियो तिन्ह ही प्रभ पायो
प्रेम प्रभु से करने की ओर इशारा किया है। अधिक नहीं लिखूंगा।
आज इतना ही।
शेष फिर कभी
श्रद्धापूर्वक
मानवता को समर्पित
निर्मल सोनी 🌺💖✍️
Friday, 14 July 2023
एक ही पूजा योग्य 🌺
नमन
वंदन
धन निरंकार जी
आइए आज इस मंत्र को आत्मसात् करते हैं
एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा।
कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च॥
One God who alone is & He lurketh hidden in every creature for He pervadeth and is the inmost Self of all beings, He presideth over all work and is the home of all things living. He is the Mighty Witness who relateth thought with thought and again He is the Absolute in whom mood is not nor any attribute.
इस 'एकमेव देव'(एक ही देव परमात्मा ) का ही अस्तित्व है, प्रत्येक प्राणी में 'यही' गूढ़ रूप से छिपा हुआ है क्योंकि 'यही' सर्वव्यापी एवं समस्त प्राणियों का 'अन्तरात्मा' है, 'यह' सभी कर्मों का अध्यक्ष-स्वामी है, एवं सभी जीवसत्ताओं का आवास है। 'यही' सकल जगत का 'महान् साक्षी' है जो विचारों में परस्पर सम्बद्धता लाता है, 'यह' है 'निरपेक्ष' एवं निर्गुण, यह हर मनोभाव और गुण से परे है।
( एकः देवः - ekaḥ devaḥ - One God who alone | सर्वभूतेषु - sarvabhūteṣu - in every creature | गूढः - gūḍhaḥ - lurketh hidden | सर्वव्यापी - sarvavyāpī - He pervadeth all beings | सर्वभूतान्तरात्मा - sarvabhūtāntarātmā - the inmost Self of all beings | कर्माध्यक्षः - karmādhyakṣaḥ - He presideth over all work | सर्वभूताधिवासः - sarvabhūtādhivāsaḥ - He is the home of all things living | साक्षी - sākṣīi - the Mighty Witness | चेता - cetā - who relateth thought with thought ? | केवलः - kevalaḥ - the Absolute | निर्गुणः च - nirguṇaḥ ca - in whom mood is not nor any attribute |
बस बाहर भीतर के भेद से मुक्त हो कर इस एक को जानना ही परम् उपलब्धि है।
बाहर भीतर एकै जानौ, यह गुरु ज्ञान बताई।
जन नानक बिना आपा चीन्हे, मिटै न भ्रम की काई।।
अर्थात
बाहर और भीतर एक ही है - यही शाश्वत परम् ज्ञान गुरु प्रदान करता है।
जब तक हम स्वयं को नहीं पहचानते कि हम कौन हैं ? हमारा वास्तविक स्वरूप क्या है ? तब तक हमारे संशयों का नाश नहीं होता। इसलिए तत्व बोध से ब्रह्म फिर स्व का बोध ही सभी भ्रमों और संशयों से मुक्ति दिलाता है। या यूं कहूं जन्मों - जन्मों से लगी भ्रम की काई (शैवाल ) मिट जाता है। जैसे शैवाल जब पानी के उपर आ जाती है तो पानी को ढक देता है। नजर नहीं आता...परंतु जैसे ही शैवाल काई को हटाते हैं तो शुद्ध निर्मल जल प्रकट होता है। ऐसे ही भ्रमों की काई हटाने से शुद्ध चैतन्य का प्रकटाव हो जाता है और भ्रमों का खात्मा हो जाता है।
आज इतना ही
विस्तार में फिर कभी।
श्रद्धा पूर्वक
मानवता को समर्पित
निर्मल सोनी
Wednesday, 12 July 2023
गुरु और गुरु की पहचान
"**गुरु और गुरु की पहचान
गुरूर्ब्रह्मा गुरूर्विष्णुः गुरूर्देवो महेश्वरः ।
गुरूर्साक्षात परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः ।।
अर्थात्
गुरू ही ब्रह्मा हैं, गुरू ही विष्णु हैं । गुरूदेव ही शिव हैं तथा गुरूदेव ही साक्षात् साकार स्वरूप आदिब्रह्म हैं । मैं उन्हीं गुरूदेव के नमस्कार करता हूँ ।
ध्यानमूलं गुरोर्मूर्तिः पूजामलं गुरोः पदम् ।
मंत्रमूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरोः कृपा ।।
अर्थात्
ध्यान का आधार गुरू की मूरत है, पूजा का आधार गुरू के श्रीचरण हैं, गुरूदेव के श्रीमुख से निकले हुए वचन मंत्र के आधार हैं तथा गुरू की कृपा ही मोक्ष का द्वार है ।
अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम् ।
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ।।
अर्थात्
जो सारे ब्रह्माण्ड में जड़ और चेतन सबमें व्याप्त हैं, उन परम पिता के श्री चरणों को देखकर मैं उनको नमस्कार करता हूँ ।
त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव ।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देव देव ।।
अर्थात्
तुम ही माता हो, तुम ही पिता हो, तुम ही बन्धु हो, तुम ही सखा हो, तुम ही विद्या हो, तुम ही धन हो । हे देवताओं के देव ! सद्गुरुदेव ! तुम ही मेरा सब कुछ हो ।
ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं
द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम् ।
एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतं
भावातीतं त्रिगुणरहितं सदगुरूं तं नमामि ।।
अर्थात्
जो ब्रह्मानन्द स्वरूप हैं, परम सुख देने वाले हैं, जो केवल ज्ञानस्वरूप हैं, (सुख-दुःख, शीत-उष्ण आदि) द्वंद्वों से रहित हैं, आकाश के समान सूक्ष्म और सर्वव्यापक हैं, तत्वमसि आदि महावाक्यों के लक्ष्यार्थ हैं, एक हैं, नित्य हैं, मलरहित हैं, अचल हैं, सर्व बुद्धियों के साक्षी हैं, सत्व, रज, और तम तीनों गुणों के रहित हैं – ऐसे श्री सद्गुरुदेव को मैं नमस्कार करता हूँ ।
आइए इस पूर्णिमा को अपने जीवन केअमावस्या अर्थात अज्ञान को सद्गुरू से ज्ञान चक्षु लेकर पूर्णिमा अर्थात् प्रकाशमय करते हैं।
मानव जीवन का लक्ष्य ही है जीवन मुक्ति का आनंद लेते हुए विदेह जीवन जीना...
आइए गुरु गीता के निम्न श्लोकों को आत्मसात् करते हैं..
सूचकादि प्रभेदेन गुरवो बहुधा स्मृताः |
स्वयं समयक् परीक्ष्याथ तत्वनिष्ठं भजेत्सुधीः ||
सूचक आदि भेद से अनेक गुरु कहे गये हैं | बुद्धिमान् मनुष्य को स्वयं योग्य विचार करके तत्वनिष्ठ सदगुरु की शरण लेनी चाहिए|
वर्णजालमिदं तद्वद्बाह्यशास्त्रं तु लौकिकम् |
यस्मिन् देवि समभ्यस्तं स गुरुः सूचकः स्मृतः ||
हे देवी ! वर्ण और अक्षरों से सिद्ध करनेवाले बाह्य लौकिक शास्त्रों का जिसको अभ्यास हो वह गुरु सूचक गुरु कहलाता है|
वर्णाश्रमोचितां विद्यां धर्माधर्मविधायिनीम् |
प्रवक्तारं गुरुं विद्धि वाचकस्त्वति पार्वति ||
हे पार्वती ! धर्माधर्म का विधान करनेवाली, वर्ण और आश्रम के अनुसार विद्या का प्रवचन करनेवाले गुरु को तुम वाचक गुरु जानो |
पंचाक्षर्यादिमंत्राणामुपदेष्टा त पार्वति |
स गुरुर्बोधको भूयादुभयोरमुत्तमः ||
पंचाक्षरी आदि मंत्रों का उपदेश देनेवाले गुरु बोधक गुरु कहलाते हैं | हे पार्वती ! प्रथम दो प्रकार के गुरुओं से यह गुरु उत्तम हैं |
मोहमारणवश्यादितुच्छमंत्रोपदर्शिनम् |
निषिद्धगुरुरित्याहुः पण्डितस्तत्वदर्शिनः ||
मोहन, मारण, वशीकरण आदि तुच्छ मंत्रों को बतानेवाले गुरु को तत्वदर्शी पंडित निषिद्ध गुरु कहते हैं |
अनित्यमिति निर्दिश्य संसारे संकटालयम् |
वैराग्यपथदर्शी यः स गुरुर्विहितः प्रिये ||
हे प्रिये ! संसार अनित्य और दुःखों का घर है ऐसा समझाकर जो गुरु वैराग्य का मार्ग बताते हैं वे विहित गुरु कहलाते हैं |
तत्वमस्यादिवाक्यानामुपदेष्टा तु पार्वति |
कारणाख्यो गुरुः प्रोक्तो भवरोगनिवारकः ||
हे पार्वती ! तत्वमसि आदि महावाक्यों का उपदेश देनेवाले तथा संसाररूपी रोगों का निवारण करनेवाले गुरु कारणाख्य गुरु कहलाते हैं |
सर्वसन्देहसन्दोहनिर्मूलनविचक्षणः |
जन्ममृत्युभयघ्नो यः स गुरुः परमो मतः ||
सर्व प्रकार के सन्देहों का जड़ से नाश करने में जो चतुर हैं, जन्म, मृत्यु तथा भय का जो विनाश करते हैं वे परम गुरु कहलाते हैं, सदगुरु कहलाते हैं |
बहुजन्मकृतात् पुण्याल्लभ्यतेऽसौ महागुरुः |
लब्ध्वाऽमुं न पुनर्याति शिष्यः संसारबन्धनम् ||
अनेक जन्मों के किये हुए पुण्यों से ऐसे महागुरु प्राप्त होते हैं | उनको प्राप्त कर शिष्य पुनः संसारबन्धन में नहीं बँधता अर्थात् मुक्त हो जाता है |
एवं बहुविधालोके गुरवः सन्ति पार्वति |ते
षु सर्वप्रत्नेन सेव्यो हि परमो गुरुः ||
हे पर्वती ! इस प्रकार संसार में अनेक प्रकार के गुरु होते हैं | इन सबमें एक परम गुरु का ही सेवन सर्व प्रयत्नों से करना चाहिए।
नित्यं ब्रह्म निराकारं निर्गुणं बोधयेत् परम् |
भासयन् ब्रह्मभावं च दीपो दीपान्तरं यथा ||
गुरु वे हैं जो नित्य, निर्गुण, निराकार, परम ब्रह्म का बोध देते हुए, जैसे एक दीपक दूसरे दीपक को प्रज्ज्वलित करता है वैसे, शिष्य में ब्रह्मभाव को प्रकटाते हैं
हे पार्वती : - परम् गुरू वे हैं जो सदैव रहने वाले निर्गुण निराकार परम ब्रह्म का ज्ञान देते हैं!!और जीवन मुक्ति का आनंद प्रसाद रुप में देते हैं।
*👏अंत में गुरुपूर्णिमा पर यही कहूंगा ।👏*
*( गुरु + पूर्ण + माँ )*
अर्थात गुरु पूर्ण परमेश्वर का दीदार करा कर अपनी गोद में बैठा देता है जो माँ के प्रेम की पराकाष्ठा है।
🙏🌹🙏🌹🙏🌹🙏
*अर्थात सर्वप्रथम माँ ही पूर्ण गुरु🌻 है*
*तत् पश्चात गुरु ही पूर्ण माँ👸 है..*
*🙏 इससे अधिक क्या लिखूं !!*
बस वक्त रहते जानिए....
*यही सनातन शाश्वत जानने योग्य है*
श्रद्धापूर्वक
मानवता को समर्पित
निर्मल सोनी🌺💢✍️
मान्यता... धर्म पर चिंतन
आइए मिलकर विचार करते हैं। आखिर कौन जिम्मेदार है इन सब के लिए। क्या एक निर्धन?क्या एक मजदूर?
क्या एक अनपढ़? क्या धन वैभव से सम्पन्न? क्या कोई विशेष धर्म से संबंधित विचारधारा वाले....
.... कहीं हम सभी जिम्मेदार तो नहीं?
We all are raising our voice about problems
Why not about solution....
Try to be part of solution, not be the part of problem....
कदम बढ़ाने होंगे। समाधान की दिशा में कदम रखना होगा ईमानदारी से...
ऐसा न हो भविष्य में कि अन्य स्पीसीज़ पूछे कि इस धरा पर कोई मनुष्य मानव नाम का प्राणी भी रहता था। मिलकर कदम बढ़ाने का समय है। एक-एक व्यक्ति को पूरी ईमानदारी से अपना कार्य करना होगा।
चाहे वह गणमान्य नेता हों प्रशासनिक अधिकारी हों या आम इंसान.....
सभी को पूर्ण ईमानदारी से अपने कर्तव्यों का निर्वहन करना होगा। एक-दूसरे के प्रति पहले स्वीकार का भाव
स्वीकारने के उपरांत ही प्रेम के अंकुर फूटते हैं।
फिर आती है व्यक्ति के अंदर विशालता का भाव।
पूरे विश्व में प्रचलित परम्पराओं आस्थाओं में या सरल शब्दों में कहूं सत्य ईश्वर अल्लाह जेहोबा आनंद गाॅड एक है..... Truth is One....
लेकिन इतना शिक्षित विश्व होने के उपरांत भी इस सीधी सी बात को समझने का प्रयास ही नहीं करता.... धर्म के नाम पर जितनी हिंसा इतिहास में हुई..... शायद ही अन्य कारणों से हुई.... ये आंकड़े हैं।
यदि सत्य एक है और अनेक नामों से मानने के कारण भेद है - तो झगड़े क्योंकर...
एक उदाहरण लेते हैं
पानी
जल
Water
आॅव
नीर
H2O
नाम से थोड़े प्यास बुझती
बस वस्तु के इस्तेमाल से ..... जानने से भी नहीं... देखने से भी नहीं।
नाम कुछ भी दें... इससे फर्क नहीं पड़ता।
बस प्रयोग मात्र करने से
एक और उदाहरण लेते हैं
गेहूँ
गंदम
Wheat
कणक
नाम अनेक पर इसके प्रयोग से भूख मिटती है।
ऐसे ये अनेक नाम हैं सत्य सनातन शाश्वत के
परन्तु है एक।
दुनिया का कोई भी व्यक्ति हो प्यास सभी की पानी पीने से ही बुझेगी.... ना नाम से ना धर्म से ना जाति से ना अमीरी - गरीबी से और ना ही पूजा अराधना से
पानी का भजन हम दिन-रात करें
हवन यज्ञ तंत्र मंत्र यंत्र करें
क्या प्यास बुझेगी किसी की या कभी बुझी है किसी की
सरल हृदय से विचार करने पर पता चलता है नहीं
कीजिए अपनी आस्था का सम्मान। मना नहीं, लेकिन इसी आस्था के नाम पर शोषण ठीक नहीं।
राम गयो रावण गयो....
सभी के शरीर जाने हैं
इसलिए भय से मुक्त हो कर धर्म का पालन करो।
भगवान श्री कृष्ण श्री मद्भग्वदगीता में एक प्रसिद्ध श्लोक है
यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति
अब चिंतन कीजिए
आखिर धर्म की हानि कहां होती है
किसी स्थान पर
नहीं
जब व्यक्ति के हृदय में होती है यह हानि
तभी कहना पड़ा।
द्वापर युग में थोड़े थे अनेक धर्म।
आप स्वतंत्र हैं सोचने पर,
लेकिन भय से मुक्त हो कर विचार करना।
शरीर मरणो धर्मा है। यह किसी का नहीं रुका।
मानव मानव से प्रेमपूर्ण रह सकता है।
संसाधन कम नहीं, लेकिन कुछेक का एकाधिकार है।इस कारण झगड़े हैं - आदमी आदमी से नफरत कर रहा है। यही शिक्षा की सब से बड़ी त्रासदी है। विज्ञान में डाॅक्टरेट के बाद भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण जन्म नहीं ले पाता क्योंकि समाज की जड़ों से निजात नहीं ले पाता। आराम से विचार करना होगा। इन्हीं को धर्म क्हा भगवान श्रीकृष्ण ने.... मान्यता... पानी का धर्म प्यास मिटाना वह सिर्फ मानव की नहीं समस्त प्रकृति की सभी प्राणियों की।
भोजन का धर्म है - भूख को शांत करना।
सूर्य का धर्म है - ऊर्जा देना.....
असंख्य उदाहरण हैं।
माँ कहो
माता जी कहो
मम्मी जी बोलो
Mom बोलो
अम्मा बोलो
आई बोलो या जननी
पुकारोगे जिस भी नाम से.....
माँ पहचान लेगी मेरी संतान पुकार रही है
इस द्वंद्व से अपने आप को मुक्त करना होगा ।
जीवन हमारी पग ध्वनि है।
जैसा व्यवहार हम अपने और अपनों के साथ चाहते हैं वैसा व्यवहार सभी से करना है - यही सनातन धर्म की देशना है।
प्रकृति में यदि ऐसे परिवर्तन हो रहे हैं
कहीं हम ही तो नहीं कारण....
खैर अधिक नहीं लिखूंगा
आप फैसला कीजिए।
आज इतना ही।
श्रद्धापूर्वकमा
नवता को समर्पित
निर्मल सोनी 😘💐✍️
Tuesday, 11 July 2023
इनकी(अल्लाह ) मौज में आ जाओ
ठहर जाती है अब भी धड़कन तुम्हारे नाम से
और एक तुम हो भूले बैठें हो आराम से !!!🥰🌺✍️
कभी-कभी अल्लाह पाक का दीदार करके भी ऐसा लगता है... जब जीवन के उतार-चढ़ाव में जरुरत महसूस होती है खुदा के साथ की और महसूस होता है यह भुला बैठे हैं।यह तो रुठना भी नहीं जानता है - बस मेरे हृदय का भाव ही यह सब।
Monday, 10 July 2023
प्रेम का आधार - स्वीकारना
प्रेम की प्राथमिक चाह - स्वीकारना है ।
Acceptance is the primary need of Love.
With Regards
Nirmal Soni 🌺💖✍️