Wednesday, 12 July 2023

मान्यता... धर्म पर चिंतन

 आइए मिलकर विचार करते हैं। आखिर कौन जिम्मेदार है इन सब के लिए। क्या एक निर्धन?क्या एक मजदूर?

क्या एक अनपढ़? क्या धन वैभव से सम्पन्न? क्या कोई विशेष धर्म से संबंधित विचारधारा वाले.... 

.... कहीं हम सभी जिम्मेदार तो नहीं?

We all are raising our voice about problems

Why not about solution....

Try to be part of solution, not be the part of problem....

कदम बढ़ाने होंगे। समाधान की दिशा में कदम रखना होगा ईमानदारी से...

ऐसा न हो भविष्य में कि अन्य स्पीसीज़ पूछे कि इस धरा पर कोई मनुष्य मानव नाम का प्राणी भी रहता था। मिलकर कदम बढ़ाने का समय है। एक-एक व्यक्ति को पूरी ईमानदारी से अपना कार्य करना होगा।

चाहे वह गणमान्य नेता हों प्रशासनिक अधिकारी हों या आम इंसान.....

सभी को पूर्ण ईमानदारी से अपने कर्तव्यों का निर्वहन करना होगा। एक-दूसरे के प्रति पहले स्वीकार का भाव

स्वीकारने के उपरांत ही प्रेम के अंकुर फूटते हैं।

फिर आती है व्यक्ति के अंदर विशालता का भाव।

पूरे विश्व में प्रचलित परम्पराओं आस्थाओं में या सरल शब्दों में कहूं सत्य ईश्वर अल्लाह जेहोबा आनंद गाॅड एक है..... Truth is One....

लेकिन इतना शिक्षित विश्व होने के उपरांत भी इस सीधी सी बात को समझने का प्रयास ही नहीं करता.... धर्म के नाम पर जितनी हिंसा इतिहास में हुई..... शायद ही अन्य कारणों से हुई.... ये आंकड़े हैं।

यदि सत्य एक है और अनेक नामों से मानने के कारण भेद है - तो झगड़े क्योंकर...

एक उदाहरण लेते हैं

पानी

जल

Water

आॅव

नीर

H2O

नाम से थोड़े प्यास बुझती

बस वस्तु के इस्तेमाल से ..... जानने से भी नहीं... देखने से भी नहीं।

नाम कुछ भी दें... इससे फर्क नहीं पड़ता।

बस प्रयोग मात्र करने से

एक और उदाहरण लेते हैं

गेहूँ

गंदम

Wheat

कणक

नाम अनेक पर इसके प्रयोग से भूख मिटती है।

ऐसे ये अनेक नाम हैं सत्य सनातन शाश्वत के

परन्तु है एक।

दुनिया का कोई भी व्यक्ति हो प्यास सभी की पानी पीने से ही बुझेगी.... ना नाम से ना धर्म से ना जाति से ना अमीरी - गरीबी से और ना ही पूजा अराधना से

पानी का भजन हम दिन-रात करें

हवन यज्ञ तंत्र मंत्र यंत्र करें 

क्या प्यास बुझेगी किसी की या कभी बुझी है किसी की

सरल हृदय से विचार करने पर पता चलता है नहीं

कीजिए अपनी आस्था का सम्मान। मना नहीं, लेकिन इसी आस्था के नाम पर शोषण ठीक नहीं।

राम गयो रावण गयो....

सभी के शरीर जाने हैं

इसलिए भय से मुक्त हो कर धर्म का पालन करो। 

भगवान श्री कृष्ण श्री मद्भग्वदगीता में एक प्रसिद्ध श्लोक है

 यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति

अब चिंतन कीजिए

आखिर धर्म की हानि कहां होती है

किसी स्थान पर

नहीं

जब व्यक्ति के हृदय में होती है यह हानि

तभी कहना पड़ा।

द्वापर युग में थोड़े थे अनेक धर्म।


आप स्वतंत्र हैं सोचने पर,

लेकिन भय से मुक्त हो कर विचार करना।

शरीर मरणो धर्मा है। यह किसी का नहीं रुका।

मानव मानव से प्रेमपूर्ण रह सकता है।

संसाधन कम नहीं, लेकिन कुछेक का एकाधिकार है।इस कारण झगड़े हैं - आदमी आदमी से नफरत कर रहा है। यही शिक्षा की सब से बड़ी त्रासदी है। विज्ञान में डाॅक्टरेट के बाद भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण जन्म नहीं ले पाता क्योंकि समाज की जड़ों से निजात नहीं ले पाता। आराम से विचार करना होगा। इन्हीं को धर्म क्हा भगवान श्रीकृष्ण ने.... मान्यता... पानी का धर्म प्यास मिटाना वह सिर्फ मानव की नहीं समस्त प्रकृति की सभी प्राणियों की।

भोजन का धर्म है - भूख को शांत करना।

सूर्य का धर्म है - ऊर्जा देना.....

असंख्य उदाहरण हैं।

माँ कहो

माता जी कहो

मम्मी जी बोलो

Mom बोलो

अम्मा बोलो

आई बोलो या जननी


पुकारोगे जिस भी नाम से.....

 माँ पहचान लेगी मेरी संतान पुकार रही है


इस द्वंद्व से अपने आप को मुक्त करना होगा ।

जीवन हमारी पग ध्वनि है।

जैसा व्यवहार हम अपने और अपनों के साथ चाहते हैं वैसा व्यवहार सभी से करना है - यही सनातन धर्म की देशना है।


प्रकृति में यदि ऐसे परिवर्तन हो रहे हैं 

कहीं हम ही तो नहीं कारण....

खैर अधिक नहीं लिखूंगा

आप फैसला कीजिए।

आज इतना ही।

श्रद्धापूर्वकमा

नवता को समर्पित

निर्मल सोनी 😘💐✍️

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