धन निरंकार जी
तुम परमात्मा में हो। लेकिन तुम लहर की भांति हो, परमात्मा सागर की भांति है। तुम रत्ती भर भी उससे दूर नहीं। रंच भर भी फासला नहीं। दूर होने का उपाय ही नहीं है। अभिन्न हो। लेकिन फिर भी तुम जान न पाओगे। जी सकते हो परमात्मा को, जान नहीं सकते। क्योंकि जीने में कोई असुविधा नहीं है, जानने में असुविधा है। क्योंकि जानने का स्वभाव है कि तुम उसे ही जान सकते हो जो तुमसे अलग है, जो तुमसे भिन्न है। जानने के लिए थोड़ी दूरी चाहिए, फासला चाहिए, थोड़ा अंतराल चाहिए। नहीं तो परिप्रेक्ष्य बनेगा नहीं। पर्सपेक्टिव चाहिए।
परमात्मा को जानने में बड़ी से बड़ी कठिनाई यही है कि उसके और तुम्हारे बीच इंच भर की भी दूरी नहीं है। कहां से खड़े होकर देखो इसे? कौन देखे दूर खड़े होकर? दूर हुआ नहीं जा सकता। तुम इससे ही जुड़े हो। तुम एक हो। दूरी होती तो हम पार कर लेते। हमने जैट ईजाद कर लिया, हम और बड़े महा जैट बना लेते; दूरी होती हम पार कर लेते। चांद पर हम पहुंच गए, कभी परमात्मा पर भी पहुंच जाते।मंगल पर भी... लेकिन परमात्मा तक नहीं।
कारण एक - परमात्मा ईश्वर से अलग ही नहीं हो आप और परमात्मा कभी खोया भी नहीं कभी
बस सद्गुरु स्मरण कराता है - यह हो तुम
त्वम् ब्रह्मास्मि
तुम ही ब्रह्म हो
ब्रह्म ही शरीर में गति का कारण है
जब यह गति स्पंदन ठहर जाता है
उसी घटना को मृत्यु कहते हैं।
खोया है खोजने के कारण। खोज रुक जाए तो तुम अभी उसे पा लो। परमात्मा को खोजना नहीं है, अपने को विश्राम में ले आना है। दौड़ शून्य हो जाए। क्योंकि दौड़ उसके लिए जो दूर हो। और जो पास हो उसके लिए दौड़ का क्या प्रयोजन है? दौड़-दौड़ कर और दूर निकल जाओगे। रुक जाओ, ठहर जाओ। यह मिला ही हुआ है। यह प्राप्त ही है। यह सदा से तुम्हारे भीतर रमा ही हुआ है। इसलिए रहस्य! अंदर ही नहीं अपितु सब जगह यही है
एक - दूसरा नहीं
बस ठहराव दीजिए
स्थितप्रज्ञ हो जाइए
बुद्ध का वह महाउद्घोष डाकू अंगुलिमाल को - मैं कब से इस ठहरे के साथ ठहरा हूं आखिर आप कब ठहरोगे।
बस ठहर गया - मन
समय भी ठहर गया और आविर्भाव हुआ आनंद का - जो आप का स्वभाव है - नियति है।
परमांनंद हुए परमांनंद को जाना ही नहीं जा सकता
ऐसे गर्भवती हुए बगैर माँ का जन्म ही नहीं हो पाता।
ऐसे परमात्मा हुए बगैर परमात्मा का प्रसाद आनंद प्राप्त नहीं हो पाता।
स्मरण कीजिए ब्रह्मज्ञान लेते हुए सद्गुरु के आवाह्न को।
ब्रह्मज्ञान से ही आत्मज्ञान संभव है
Self realization is only possible through God realization 🌺
Self is more important to be realized before death.
जीवन रहते यह अनुभूति
सद्गुरु भी ज्ञान होता है
शरीर तो निमित्त मात्र है।
कभी नरसिंह अवतार में, तो कभी वराह, कभी मछेंद्र... कभी श्री राम तो कभी श्री कृष्ण..कभी हजरत मुहम्मद कभी हजरत ईसा . कभी गुरुनानक देव जी महाराज से लेकर गुरु गोविंद सिंह जी महाराज तक...
बस शरीर निमित्त मात्र है.....
इसलिए ज्यादा बुद्धि मन का चिंतन मत कीजिए। किसी लेखक के प्रथम पाठ पढ़कर लेखक के भाव को समझ नहीं सकते।
After reading First Lesson or any one Chapter you can't be able to understand the whole perspective of writer...
इसलिए छोटी-सी बात को पकड़ कर जीवन को व्यर्थ में जाने दें।
शहनशाह जी ने एक बड़ा अनूठा शब्द बोला.... कहीं शोषित न करे कोई
इसलिए फैसला सुनाया
गुरु वचन है ज्ञान गुरु का
निरंकार है इसका नाम
सद्गुरु का सम्मान सदैव रहेगा और रहता है। लेकिन समझना होगा
शहनशाह के इस शब्द को भी
मेरे ब्यां है हलफिया लोको
हुण मैं जमणा मरणा नहीं
एक और शब्द
जिन्हां रब दा दर्शन कीता एहनां दा सत्कार करो।
रब बोले एहनां दे अन्दर एहनां नूं नमस्कार करो ।।
नकल'च लुक्या असल है जेहड़ा एहदे
नाल प्यार करो
ख्याल रखना प्रेम सिर्फ व सिर्फ नकल में असल यह जो परमात्मा है इस से करने को कहा कि गया है।
जिन्ह प्रेम कियो तिन्ह ही प्रभ पायो
प्रेम प्रभु से करने की ओर इशारा किया है। अधिक नहीं लिखूंगा।
आज इतना ही।
शेष फिर कभी
श्रद्धापूर्वक
मानवता को समर्पित
निर्मल सोनी 🌺💖✍️
No comments:
Post a Comment