Wednesday, 24 January 2024

सद्गुरु देवायः नमोः

 शुभ प्रभात

नमस्कार

सत्य श्री अकाल

सलाम

Good Morning


आइए चिन्तन करते हैं निम्न दोहे में छिपे अनूठे संदेश पर... सद्गुरु का आना जीवन का परम् आनंद है

जीवन मुक्ति है सद्गुरु का सानिध्य

प्रेमा-भक्ति का आगाज़ है सद्गुरु की उपस्थिति

सद्गुरु ही जीवन है। 


*लोहा पारस परस के कंचन भयी तलवार*

*तुलसी तीनों न मिटे धार मार आकार*


अर्थात्


लोहे की बनी तलवार जब पारस के संपर्क में आती है तब वह सोने की हो जाती है लेकिन तलवार का कर्म ( धार, मार व आकार ) नहीं बदलता है।


*ज्ञान हथोड़ा जो मिले सतगुरु मिले सुनार*

*तुलसी तीनों मिट जाये धार मार आकार*


अर्थात् 


जब जीवन में सत्गुरु आते हैं तथा ब्रह्मज्ञान की कृपा होती है तब सब कुछ बदल जाता है। इंसान का स्वभाव केवल सत्गुरु के मिलने पर ही बदलता है।


क्यूँ कि सद्गुरु अपने अस्तित्व में समाहित करने में सक्षम है।


सद्गुरु सम नहीं कोई देव

सद्गुरु इस अखंड एक निराकार ईश्वर परम् पिता परमात्मा का दीदार कराने में सक्षम है।

आइए निम्न श्लोकों का उच्चारण करते हुए हुए सद्गुरु का यशोगान करते हैं साथ में अर्थ को भी समझने का प्रयास करते हैं। आइए मुझ संग इस दिव्य यात्रा के आनंद में सराबोर होते हैं। भोर की इस बेला को अविस्मरणीय बनाने की दिशा में एक कदम रखते हैं। सच कहूं एक कदम यदि पूरी ईमानदारी से रखा जाए फिर वही कदम मंजिल बन जाता है।

#जो फासले हमीं ने बनाए थे एक रोज

उन फसलों को तूने मंजिल बना दिया 🌺 💐


आइए गुरु गीता के श्लोक संग प्रवेश पाते हैं

शाश्वत सनातन आनंद में 


अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम् ।

तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥


अर्थात जो समस्त संसार में, सभी चर(चलायमान) और अचर(स्थिर) प्राणियों में व्याप्त हैं जिनके द्वारा उन चरणों(ईश्वर का साक्षात्कार) को दिखाया जाता है उन गुरु को प्रणाम है।


अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया ।

चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥


अर्थात जिन्होंने ज्ञान रूपी अञ्जन को हमारी अंधी आँखों से(अंतःकरण) से अज्ञान रूपी अंधकार का नाश किया है, जिनके द्वारा मेरे नेत्र (अंतःकरण) खुले हैं ऐसे गुरु को नमस्कार है।


गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः ।

गुरुरेव परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥


अर्थात गुरु ही ब्रह्मा हैं, गुरु ही विष्णु हैं, गुरु ही महेश्वर(शिव) हैं गुरु ही साक्षात परम ब्रह्म हैं उस गुरु को नमस्कार है।

भाव यह है कि गुरु ही सृजन - पोषण-प्रलय का आधार है। 


स्थावरं जङ्गमं व्याप्तं यत्किञ्चित्सचराचरम् ।

तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥


अर्थात जो सभी स्थायी और अस्थायी तथा जो चर और अचर में विद्यमान हैं जिनके द्वारा उन चरणों(ईश्वर का साक्षात्कार) को दिखाया जाता है उन गुरु को प्रणाम है।


चिन्मयं व्यापि यत्सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम् ।

तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥


अर्थात चेतना का वह रूप जो तीनों लोकों में सभी चर और अचर में व्याप्त है, जिनके द्वारा उन चरणों(ईश्वर का साक्षात्कार) को दिखाया जाता है उन गुरु को प्रणाम है।


सर्वश्रुतिशिरोरत्नसमुद्भासितमूर्तये ।

वेदान्ताम्बूजसूर्याय तस्मै श्रीगुरवे नमः।। 


अर्थात जो सभी श्रुतियों(वेदांत, उपनिषद) का साकार रूप हैं जो मस्तक पर धारण किये हुए मणि के समान चमकते हैं जो सूर्य के समान वेदांत रूपी कमल को खिलाने वाले हैं उन गुरु को नमस्कार है।


चैतन्यं शाश्वतं शान्तं व्योमातीतं निरंजनं।

नादबिंदु कलातीतं तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ 


अर्थात जो शुद्ध शाश्वत चेतना हैं जो स्वच्छ और आकाश से परे है, जो बिंदु, नाद(दिव्य ध्वनि) और कला(समय की इकाई) से भी परे हैं उन गुरु को नमस्कार है।


ज्ञानशक्तिसमारूढः तत्त्वमालाविभूषितः ।

 भुक्ति मुक्ति प्रदाता च तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥


अर्थात जिनके पास ज्ञान और शक्ति समान रूप से है (सामंजस्य है), जो तत्व(सत्य) रूपी माला से विभूषित हैं, जो सांसारिक सुख और मुक्ति(मोक्ष) के दोनों के दाता हैं उन गुरु को नमस्कार है।


अनेकजन्म सम्प्राप्त कर्मबन्धविदाहिने ।

 आत्मज्ञानप्रदानेन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥


अर्थात आत्मज्ञान रूपी अग्नि को प्रदान कर जो अनेक जन्मों के कर्मों(पूर्व जन्म के कर्मों) का नाश करने वाले हैं उन गुरु को नमस्कार है।


शोषणं भवसिन्धोश्च ज्ञापनं  सार सम्पदः ।

 गुरोः पादोदकं सम्यक् तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ 


अर्थात जो संसार रूपी समुद्र को सुखाकर हमें असली सम्पदा को प्रदान करने वाले हैं, जिनके पैरों का जल समान रूप से भक्त के मन से संसार की छाप को मिटाकर जो असली सम्पदा है (आध्यात्मिक ज्ञान ) प्रदान करते हैं उन गुरु को नमस्कार है।


न गुरोरधिकं तत्त्वं न गुरोरधिकं तपः ।

न गुरोरधिकं ज्ञानं तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ 


अर्थात गुरु के सिवाय कुछ अन्य सत्य नहीं है, न ही गुरु से बड़ा कोई तप है गुरु के सिवा कोई अन्य तत्व ज्ञान प्रदाता नहीं है उन गुरु को नमस्कार है।


मन्नाथः श्रीजगन्नाथः मद्गुरुः श्रीजगद्गुरुः ।

 मदात्मा सर्वभूतात्मा तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ 


अर्थात मेरे जो स्वामी है वह जगत के नाथ हैं, मेरे जो गुरु हैं वह ब्रह्माण्ड के गुरु हैं, मेरी जो चेतना है वही जगत की चेतना है उन गुरु को नमस्कार है।


गुरुरादिरनादिश्च गुरुः परमदैवतम् ।

गुरोः परतरं नास्ति तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥


अर्थात ऐसा कोई सत्य नहीं है जो गुरु से पहले हो, गुरु ही परम देवता हैं, गुरु के समान कोई दूसरा नहीं है उन गुरु को नमस्कार है।


यत्सत्येन जगत्सर्वं यत्प्रकाशेन भ्रान्तियत।

यदानन्देन नंदैन्ति तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ 


अर्थात जिस सत्य से समस्त जगत है, जिसके प्रकाश से संसार प्रकाशित है, जिस आनंद से संसार आनंदित है उन गुरु को नमस्कार है।


नित्यशुद्धं निराभासं निराकारं निरंजनं।

नित्यबोधं चिदानन्दम गुरुर्ब्रह्मानमाम्यहम ॥ 


अर्थात जो नित्यशुद्ध हैं, जो आभासरहित हैं, जो निराकार हैं, जो इन्द्रियों से परे हैं, जो नित्य ज्ञानस्वरूप हैं, जो चिदानंद हैं ऐसे ब्रह्मस्वरूप श्रीगुरुदेव को मैं प्रणाम करता हूँ।


ध्यानमूलं गुरोमूर्ति पूजा मूलं गुरोरपदं।

मंत्र मूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरोर्कृपा ॥


अर्थात गुरुमूर्ति का ध्यान ही सब ध्यानों का मूल है, गुरु के चरणकमल की पूजा ही सब पूजाओं का मूल है, गुरुवाक्य ही सब मन्त्रों का मूल है और गुरु की कृपा ही मुक्ति प्राप्त करने का प्रधान साधन है।


नमामि श्रीगुरुपादपल्लवम्।

स्मरामि श्रीगुरुनाम निर्मलम्। 

पश्यामि श्रीगुरु रूप सुन्दरम्।

 श्रृणोमि श्रीगुरु कीर्ति अद्भुतम् ॥ 


अर्थात श्री गुरु के चरण कमलों को नमस्कार है, श्री गुरु के निर्मल नाम का स्मरण है, श्री गुरु के सुन्दर रूप का ध्यान करो, श्री गुरु की अद्भुत कीर्ति का श्रवण करो।


गुरु की एक ही पहचान है कि वह परमात्मा ईश्वर शाश्वत का दीदार दर्शन कराए। अन्य सब गौण है।

गुरु की एक ही निशानी पारब्रह्म निकट कर जानि।।


शेष फिर कभी।

आज इतना ही।

सभी को नमन।

धन निरंकार जी 💐 


श्रद्धापूर्वक 

मानवता को समर्पित 

निर्मल सोनी 🥰 🌺 ✍️

No comments:

Post a Comment